दो जुलाई 1962 के वो दो मिनट, यमुना जल हो गया था लाल

दो जुलाई 1962 के वो दो मिनट, यमुना जल हो गया था लाल  
-इस घटना के बाद देशभर में रेलवे ने उठाये थे कई कदम
   मथुरा । यमुना के कैंची पुल पर 2 मिनट में पुल से कटे थे 400 परिक्रमार्थी, ट्रेन की छत पर बैठे थे, हर साल मुड़िया पूर्णिमा मेला के दौरान लाखों श्रद्धालु गोवर्धन की परिक्रमा को निकलते हैं लेकिन इसी दौरान एक भयावह स्मृति मन में उभर आती है, दो जुलाई 1962 की वह भीषण त्रासदी जिसने मथुरा के कैंची पुल को मौत के प्रतीक के रूप में दर्ज कर दिया ।
   यह हादसा न सिर्फ मथुरा बल्कि भारतीय रेलवे के इतिहास की सबसे हृदय विदारक दुर्घटनाओं में से एक है जिसमें एक अनुमान के मुंताबिक 400 से अधिक श्रद्धालु तीर्थयात्रियों की जानें चली गईं थीं, हादसा उत्तर रेलवे की मीटर गेज लाइन पर चलने वाली एक आठ बोगियों वाली पैसेंजर ट्रेन के साथ हुआ, जो कासगंज से चलकर अछनेरा की ओर जा रही थी, कासगंज, हाथरस और मुरसान स्टेशनों से भारी संख्या में श्रद्धालु इस ट्रेन में सवार हो चुके थे, श्रद्धालु गोवर्धन में मुडिया मेला पर गोवर्धन परिक्रमा लगाने जा रहे थे, जब ट्रेन राया स्टेशन पहुंची, वहां पहले से ही करीब दो हजार यात्री और प्रतीक्षा में खड़े हुए थे। ट्रेन पहले ही भरी हुई थी, लेकिन भीड़ ने डिब्बों की छतों पर चढ़कर अपना स्थान बना लिया। 
   ट्रेन की स्थिति इतनी भयावह थी कि गार्ड और ड्राइवर ने ट्रेन को आगे ले जाने से मना कर दिया। कहा जाता है कि इस पर श्रद्धालुओं ने उन्हें पीट दिया था। श्रद्धालुओं के दबाव में आकर चालक ने ट्रेन को आगे बढ़ा दिया। मानसिक रूप से आहत और डर के साये में उसने भाप इंजन को अत्यधिक गति से चलाना शुरू कर दिया। रेल विभाग की उस समय की अनिवार्य चेतावनी ‘पुल पार करते समय गति धीमी करें’ की भी ड्राइवर ने अनदेखी कर दी। परिणामस्वरूप, मथुरा में यमुना पर कैंची के आकार में बने पुल पर ट्रेन असंतुलित हो गई। जैसे जैसे ट्रेन आगे बढी, लोग कटते चले और यमुना में गिरने लगे थे। हालत यह हो गई थी कि यमुना का जल खून से लाल हो गया। रेल की छत पर बैठे लोगों की आवाज दब गयी। तभी से इसे मौत का पुल कहा जाने लगा। 
    अनुमान लगाया जाता है कि इस भीषण त्रासदी में 400 से अधिक श्रद्धालुओं की जान चली गई, पद्म श्री वरिष्ठ पत्रकार मोहन स्वरूप भाटिया, जो उस समय रिपोर्टिंग कर रहे थे बताते हैं कि यह हादसा एक मानव भूल, भीड़ का दबाव और रेलवे की लापरवाही का घातक परिणाम था जिसने सैकड़ों परिवारों को उजाड़ दिया, इस हृदयविदारक घटना के बाद भारतीय रेलवे ने देश भर में नदियों पर बने कैंची आकार के पुलों को हटाने का निर्णय लिया और उन्हें समाप्त कर दिया गया, साथ ही मथुरा में मुडिया पूनों जैसे पर्वों पर आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए विशेष इंतज़ाम किए जाने लगे ।
 

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