अब ब्रज में चट्टा चौथ नहीं आती, मनाते हैं गणेश चतुर्थी

अब ब्रज में चट्टा चौथ नहीं आती, मनाते हैं गणेश चतुर्थी 
-ब्रज में रहा है गणेश चतुर्थी परंपरागत स्वरूप चट्टा चौथ 
    मथुरा । तीज त्योहारों का सामाजिक महत्व और उन्हें परंपरागत रूप से मनाने के तरीके कुछ वर्षाे में पूरी तरह से बदल गये हैं, तीन से चार दशक पहले तक ब्रज में जिन पर्व और त्येाहरों को जिस स्वरूप में मनाया जाता था अब लोग उस स्वरूप में इन्हें नहीं मना रहे जबकि नई पीढी यह जानती नहीं कि ये पर्व कुछ दशक पहले किस तरह मनाये जाते थे, गणेश चतुर्थी यानी ब्रज की चट्टा चौथ को मनाने का तरीका  कुछ दशक पहले तक आज जैसा नहीं था, अब गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की मूर्ति की घर में स्थापना की जाती है।  
    सार्वजनिक रूप से गली मोहल्लों, नुक्कड़ों अथवा सोसाइटियों में पंडालों में गणपति बप्पा को विराजमान कर कई दिनों तक पूजा पाठ और दूसरे कार्यक्रम चलते हैं इसके बाद नदी, कुण्ड, तालाबों में गणेश जी की प्रतिमाओं का गाजे बाजे के साथ विसर्जन किया जाता है, बडी शिक्षण संस्थानों में भी प्रतिमाओं की पंडालों में स्थापना की जाती हैं, कुछ दशक पहले तक ब्रज में चट्टा चौथ मनाने का यह वर्तमान स्वरूप नहीं था, ब्रज भाषा में चट्टा विद्यार्थी को कहा जाता है और चौथ चतुर्थी को, यानी यह विद्यार्थियों को समर्पित आयोजन था, गांव में बमुश्किल एक स्कूल होता था, विद्यालय में जुलाई के अंत तक प्रवेश प्रक्रिया पूरी हो जाती थी। अगस्त के महीने में चट्टा चौथ तक पढ़ाई ढर्रे पर आ जाती थी। 
  यह भी पता चल जाता था कि कौन सा बच्चा नियमित रूप से विद्यालय आ रहा है और कौन नहीं, कितने बच्चे स्कूल आने के बाद बंद हो गये और प्रवेश पाने योग्य आयु के कितने बच्चे स्कूल आये ही नहीं, किस बच्चे ने पढाई छोड दी है, चट्टा चौथ की तैयार पाठशाला में होती थी तो पाठशाला जाने वाले बच्चों के घरों में भी कई दिन पहले से तैयारी शुरू हो जाती थीं। गणेश चतुर्थी के दिन पाठशाला में आने वाले बच्चों और गुरुओं के साथ गुड़धानी के लड्डुओं से इस त्यौहार को मनाया जाता था, आज के दिन सुबह से शुरू हुई चट्टों की आवाजें दोपहर तक रुकने का नाम नहीं लेती थीं, आसपास गली मोहल्ला तक महक जाता था और जब गणेश जी के भोग लगता था तो चौक दालान में बने बिलों से चूहे तक निकल आते थे, गुड़धानी के गुड़ और देशी घी के स्वाद में उत्तमता होती थी। 
   दाऊजी का मेला जो कि बल्देव छठ के दिन होता है की अनौपचारिक शुरुआत भी हो जाती थी, चट्टा चौथ पर गुरुजनों के संरक्षण में पाठशाला के सभी विद्यार्थी गांव में निकलते थे, गुरूजी पूरे जत्थे के साथ हर विद्यार्थी के घर पहुंचते थे। हर घर पर पहले से ही बच्चों और गुरूजी की आवभगत की पूरी तैयारी की जाती थी, बच्चों को गुडदानी आदि खाने को दी जाती थी तो गुरूजी का पूरा सम्मान होता था, बच्चे के बारे में गुरूजी अभिभावकों से वार्ता करते थे, जिस बच्चे का घर होता था उसे भीड से बुलाया जाता था ।
   गुरूजी समझाते थे कि बच्चे को लगातार पाठशाला भेंजें। बच्चे की प्रसंशा भी करते थे और कमजोरियों पर बात भी करते थे। इस दौरान गुरूजी यह भी जान जाते थे कि बच्चे के घर के हालात कैसे हैं और बच्चा किन परिस्थितियों में है, उसी के हिसाब से वह बच्चे के लिए सोचते थे। यह आज की पेरेंट्स मीटिंग और गैट टू गैदर का पुराना लेकिन भला और सटीक तरीका था। जो बच्चे बीच में स्कूल छोड रहे होते थे उन बच्चों और बच्चों के परिजनों को भी समझाया जाता था। जो स्कूल नहीं जा रहे थे उन्हें स्कूल आने के लिए और प्रवेश लेने के लिए प्रेरित किया जाता था, कहा जा सकता है कि यह आज निकाले जाने वाली स्कूल चलो रैली का भी एक स्वरूप था लेकिन बेहतर और आत्मीय था ।

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