"आज बिरज में होरी रे रसिया", "बिरज में चहुंओर मच्यो होरी को हुड़दंग

"आज बिरज में होरी रे रसिया", "बिरज में चहुंओर मच्यो होरी को हुड़दंग  
-रंगभरनी एकादशी पर श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर खेली गई होली, ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर में भी उमड़ी भीड़
   मथुरा । ब्रज में होली का उल्लास अपने चरम पर पहुंचा गया है, रमणरेती, बरसाना नंदगांव से होते हुए रंगभरनी एकादशी पर समूचा ब्रज होली के उत्सव में सराबोर हो गया, वृंदावन में ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती रही, ठाकुर जी ने भक्तों संग होली खेली, वहीं मथुरा के द्वारकाधीश मंदिर में कुंज में विराजमान होकर ठाकुर जी ने होली खीली और श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर सांस्कृतिक व लठामार होली का आयोजन हुआ, "होरी को हुड़दंग मच्यौ है चहुं ओर ब्रज में" बृजवासी होली के उल्लास में डूबे हैं, देश विदेश से आये लाखों लाख श्रद्धालु भी मगन हैं ।


   बरसाना और नंदगांव, रावल होते हुए रंगभरी एकादशी को होली का हुडदंग मथुरा, वृंदावन की गलियों में पहुंच गया, ब्रजवासी होरी के उल्लास को हुडदंग ही कहते हैं, ब्रजवासियों के उल्लास को देखकर बाहर से आने वाले श्रद्धालु भी उल्लासित और अचरज में हैं इसलिए इसे होली का धमाल रंगभरनी एकादशी को मथुरा में मचा, समूचा श्रीकृष्ण जन्मस्थान परिसर राधा कृष्ण की प्रेम भरी होली के रंग में रंग गया, ऐसा लगा मानो उड़त गुलाल लाल भये बदरा, सुबह से ही श्री कृष्ण जन्मस्थान में श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला शुरू हो गया था, लीला मंच के सामने का पूरा मैदान दोपहर तक खचाखच भर गया था । 
  भागवत भवन को जाने वाली सीढियों पर लोग बैठ गये और कुछ देर में वहां भी जगह नहीं बची, लोग जहां स्थान मिला वहीं जम गये, लीला मंच पर कलाकारों द्वारा दी जा रही होली की प्रस्तुतियों पर श्रद्धालु मगन होकर झूम रहे थे, पूरा वातावरण अलौकिक अनुभूति करा रहा था, वातावरण में भक्ति और कला का संगमन जो हो रहा था, आंखों पर सीधा पड रहे सूरज की गर्मी जब कुछ कम होने लगी और सूर्य देव पश्चिमांचल को जाने लगे तो होली की मस्ती अपने चरम पर पहुंच गई, नंदगांव, बरसाना, रावल की तरह यहां भी लठामार होली का आयोजन होता है लेकिन सभी की अपनी कुछ विशेषताएं हैं ।
   जन्मभूमि की होली भी इससे अछूती नहीं रही, लीला मंच की छत पर गुलाल की बोछार के लिए पंप लगाए गये थे, पुष्पों, चंदन और गुलाल की खुशबू से वातावरण महक रहा था, अभी लोग लीला मंच पर कलाकारों की प्रस्तुतियों का आनंद ले रही रहे थे कि नजारा एक दम बदल गया, सांस्कृतिक होली का यह उत्सव लठामार होली में बदल गया, सुंदर परिधानों में सजीं हुूरियानें हाथों में सुसज्जित लाठियां लेकर मैदान में उतर आई, वहीं दूसरी ओर कमर में फैट बांधे हूरियारे भी आ गये, ब्रज की प्राचीन होली की सांखी परंपरा जैसा दृश्य बन गया, इसके बाद जमकर लठामार होली खेली गई, पता ही नहीं चला भगवान भास्कर कब पश्चिमांचल गामी हो गये। 
  श्रीकृष्ण जन्मस्थान की प्राचीर और पताका भगवान भास्कर की रश्मियां पड रहीं थीं लेकिन नीचे शाम ढल चुकी थी, इसके बाद हुरियारों ने हुरियारिनों को नमन किया, श्रद्धालु भी निकास द्वार से प्रस्थान करने लगे, होली के इस पावन अवसर पर जन्मस्थान लीला मंच पर राधा कृष्ण स्वरूपों द्वारा लीला का मंचन किया गया जिसमें मथुरा के हुरियारे और हुरियारिनों ने लोक गीतों पर जमकर ठुमके लगाए, फिर वहां चाहे ब्रज का प्रसिद्ध मयूर नृत्य हो या फिर गागर, जेयर, या फिर हो चरकुला नृत्य इस मनमोहक प्रस्तुति को देख कर वहां उपस्थित श्रद्धालु मंत्र मुग्ध हो गए और सभी नाचते गाते हुए प्रिया प्रीतम रंग में रंग गए ।

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