बड़ा दुर्लभ होता है संतों का सत्संग-गुरु शरणानंद महाराज
बड़ा दुर्लभ होता है संतों का सत्संग-गुरु शरणानंद महाराज
-श्रौतमुनि निवास आश्रम में मनाया गया योगिराज रामानंद महाराज का जयंती उत्सव
मथुरा । गांधी मार्ग स्थित श्रौतमुनि निवास आश्रम में रविवार को योगिराज रामानंद महाराज के जयंती उत्सव संतों के पावन सानिध्य में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया, दीप प्रज्ज्वलित कर शुभारंभ करते हुए कार्ष्णि महामंडलेश्वर गुरु शरणानंद महाराज ने कहा कि संतों का सत्संग बड़ा दुर्लभ होता है, संत हमारे जीवन को भक्ति से अनुरक्त करते है, संत जिसका हाथ पकड़ लेते है उसका साथ कभी छोड़ते नही, संग का प्रभाव अपना स्थायी भाव रखता है, कहा कि सृष्टि को सुधारने की आवश्यकता नहीं है दृष्टि सुधारने की आवश्यकता है, केवल गुरु ही अन्तःकरण को शुद्ध करता है।
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महामंडलेश्वर स्वामी आनंद भास्कर महाराज ने कहा कि संसार में हर स्थान पर जीवन निर्वाह की कला सिखाई जाती हैं लेकिन गुरू के सानिध्य में जीवन का निर्वाह ही नहीं जीवन का निर्माण किया जाता है, निर्वाह के लिये आधुनिक साधनों का उपयोग किया जाता है, लेकिन जीवन निर्माण में प्रेम, दया सदाचार को अपनाया जाता है, कार्ष्णि जगदानंद मीत ने कहा कि प्रभू और गुरू के सानिध्य में मन की कुटिलता जाती है, मन को पवित्र और पावन करने के लिये निष्पाप और निष्कलंक निर्दाेष व्यक्तित्व के पास जाकर अपने जीवन को अधोमुखी से ऊर्धमुखी बनाया जा सकता है ।
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भागवताचार्य अनिरुद्धाचार्य ने कहा कि संत अगर क्रोध भी करें तो उसे आशीर्वाद ही समझना चाहिए। संतों के सानिध्य में सैदव शान्ति मिलती है। पीपा पीठाधीश्वर बाबा बलराम दास ने कहा कि जयंती उन्हीं की मनाई जाती है जो जीवन में संसार के उद्धार के लिए कार्य करते है, उमा पीठाधीश्वर स्वामी रामदेवानंद ने कहा कि हम सभी को गुरु के प्रति निष्ठा रखनी चाहिए। गुरु शिष्यों की परीक्षा लेते हैं, जब शिष्य परीक्षा में पास हो जाते हैं तो गुरु उसे सर्वश्व सौंप देते है, सत्संग से हम को भक्ति प्राप्त होती है, आधी घड़ी का संत सत्संग भी हमारे अपराधों को काट देता है, स्वामी शिव स्वरूपानंद ने कहा कि जब सद् गुरुदेव की कृपा प्राप्त होती है तब हमको भगवत कृपा मिलती है ।
पूर्व केन्द्रीय मंत्री निरंजन जयोति ने कहा कि संतों की संगति का प्रभाव जीव पर चिरकाल तक रहता है, जीव के स्वभाव को सन्त ही सुधारते है, संत का स्वभाव निश्छल होता है, डॉ0 निर्मल दास ने कहा कि भक्ति , सत्संग और सन्त शब्दों का अर्थ क्रमशः सेवा, सत्य की संगति और सन्त महात्मा के रूप में ग्रहण किया जाता है, किन्तु भक्ति को यदि भंग होने में ग्रहण करें तो उसका अर्थ होगा, शरीर संसार के मोह का भंग हो जाना, स्वामी शरणानंद, स्वामी सर्वचौतन्य, स्वामी बह्मचौतन्य, नेत्रपाल शास्त्री, रमेशानंद सरस्वती, शिव स्वरूपानंद, नरोत्तम शास्त्री, महामंडलेश्वर नवलगिरी, स्वामी वेदानंद, स्वामी अद्वैतमुनि, स्वामी परमानंद सरस्वती, स्वामी गुरुदास, सरवन मुनि, नेत्रपाल शास्त्री, कमल वाधवा, मंच संचालन डॉ0 अनिलानंद महाराज ने किया ।






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