राजनीतिक बेरोजगारी के दौर में रालोद कार्यकर्ता

राजनीतिक बेरोजगारी के दौर में रालोद कार्यकर्ता  
-कार्यकर्ताओं में बेचैनी, नहीं हो रहा सत्ता का अहसास
  मथुरा । रालोद कार्यकर्ताओं में बेचैनी है, रालोद कार्यकर्ता बेहद असहज स्थित का सामना कर रहे हैं, चुनिंदा पदाधिकारियों को छोड़कर अधिकांश कार्यकर्ता असहज स्थिति में हैं, वह खुद को न सत्ता पक्ष में महसूस कर पा रहे हैं और नहीं विपक्ष में, कई कार्यकर्ताओं का कहना है कि वह राजनीतिक बेरोजगारी के दौर से गुजर रहे हैं, वह न जन आंदोलन का हिस्सा हैं और सत्ता पक्ष का ।
   राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के महानगर अध्यक्ष जितेंद्र प्रजापति ने नगर निगम में नामित पार्षदों की हाल ही में जारी सूची पर गहरी नाराजगी और निराशा व्यक्त की है, उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन में रहते हुए भी रालोद के किसी भी समर्पित कार्यकर्ता या प्रतिनिधि को स्थान न मिलना अत्यंत खेदजनक और चिंताजनक है, उन्होंने कहा है कि गठबंधन केवल चुनावी समीकरणों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें सभी सहयोगी दलों की सम्मानजनक, संतुलित एवं न्यायपूर्ण भागीदारी भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। 
   रालोद के जमीनी स्तर पर कार्य कर रहे निष्ठावान कार्यकर्ताओं की लगातार अनदेखी, गठबंधन की भावना और आपसी विश्वास पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है। उन्होंने आगे कहा कि राष्ट्रीय लोक दल हमेशा से किसान, व्यापारी एवं आमजन के हितों की आवाज़ उठाता रहा है और गठबंधन में उसकी भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। ऐसे में प्रतिनिधित्व से वंचित रखना न केवल रालोद के कार्यकर्ताओं के मनोबल को प्रभावित करता है, बल्कि गठबंधन की मजबूती को भी कमजोर करता है। महानगर अध्यक्ष ने उन्होंने कहाकि शीर्ष नेतृत्व, जिसमें रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी भी शामिल हैं, इस मुद्दे पर सकारात्मक पहल करते हुए सभी सहयोगी दलों के सम्मान और अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए। 
 उन्होंने कहा कि रालोद कार्यकर्ताओं के सम्मान और अधिकारों के लिए सदैव सजग और प्रतिबद्ध रहेगा, आवश्यकता पड़ने पर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज़ को और बुलंद करेगा, वहीं दूसरी ओर रालोद के एकमात्र जनप्रतिनिधि एमएलसी योगेश नौहवार अपने ही क्षेत्र में भाजपा के साथ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में फंसे हैं, वह कई बार खुल कर तो कई बार इशानों में आपनी लाचारी और बेचैनी जाहिर कर रहे हैं, नेताओं हाल देख कार्यकर्ता चुप्पी साधे हुए हैं। रालोद के लिए अपने कार्यकर्ताओं को संजोकर रखना भी एक चुनौती बना हुआ है। यदुवीर सिंह सिसौदिया प्रकरण इसी का उदाहरण है।

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