“इकाना स्टेडियम का ट्रैफिक जाम : समस्या सिर्फ प्रशासन नहीं, वकीलों की चुप्पी भी जिम्मेदार”

“इकाना स्टेडियम का ट्रैफिक जाम : समस्या सिर्फ प्रशासन नहीं, वकीलों की चुप्पी भी जिम्मेदार”

   लखनऊ का आधुनिक चेहरा कहे जाने वाला "भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी इकाना क्रिकेट स्टेडियम" आज एक विडंबना का प्रतीक बन चुका है, एक ओर यह अंतरराष्ट्रीय स्तर की खेल सुविधाओं का दावा करता है तो दूसरी ओर हर बड़े मैच या आयोजन के समय इसके आसपास का इलाका ट्रैफिक अराजकता का केंद्र बन जाता है, सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पार्किंग की व्यवस्था अधूरी क्यों है, बल्कि यह भी है कि कानून के जानकार #वकील इस अव्यवस्था पर खामोश क्यों हैं ?

 समस्या का वास्तविक चेहरा : योजनाबद्ध अव्यवस्था

 हर मैच के दिन सैकड़ों नहीं, हजारों वाहन सुषांत गोल्फ सिटी और आसपास की सड़कों पर बेतरतीब खड़े दिखाई देते हैं:-

@ एम्बुलेंस तक फंस जाती है

@ स्थानीय निवासी घरों में कैद हो जाते हैं

@सार्वजनिक सड़कें “अस्थायी पार्किंग” में बदल जाती हैं

  यह केवल ट्रैफिक जाम नहीं बल्कि शहरी नियोजन की विफलता है ।

   प्रशासन की विफलता : लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती, निश्चित रूप से लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) और अन्य एजेंसियों की जिम्मेदारी बनती है कि वे मल्टीलेवल पार्किंग जैसी बुनियादी सुविधाएं समय पर उपलब्ध कराएं लेकिन सवाल यह है कि जब यह समस्या वर्षों से बनी हुई है तो न्यायपालिका के दरवाजे क्यों नहीं खटखटाए गए ?

  वकीलों की भूमिका : कानून जानकर भी निष्क्रियता क्यों ?

  @लखनऊ जैसे शहर में हजारों वकील प्रैक्टिस करते हैं, वे जानते हैं कि :-

#अनुच्छेद 21 के तहत “जीवन का अधिकार” सिर्फ जीवित रहने तक सीमित नहीं, बल्कि सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन भी शामिल है

# ट्रैफिक जाम और अव्यवस्था सीधे-सीधे इस अधिकार का उल्लंघन है, फिर भी इस मुद्दे पर जनहित याचिकाओं  की संख्या नगण्य है ।

  @यह स्थिति कुछ गंभीर सवाल भी खड़े करती है:-

# क्या वकील केवल व्यक्तिगत मामलों तक सीमित हो गए हैं ?

#क्या जनहित अब “प्राथमिकता” नहीं रहा ?

#या फिर यह सिस्टम से टकराने का डर है ?

  विधिक जागरूकता की कमी या सुविधा का मौन ? यह कहना गलत नहीं होगा कि वकीलों के एक बड़े वर्ग में विधिक सक्रियता (लीगल एक्टिविज़्म) की कमी दिखाई देती है ।

   @जहां एक ओर छोटे-छोटे मुद्दों पर अदालतों का दरवाजा खटखटाया जाता है, वहीं इस तरह की व्यापक जन-समस्या पर चुप्पी यह दर्शाती है कि:

# या तो समस्या को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा

# या फिर सुविधाजनक मौन को चुना जा रहा है

   जनहित याचिका : एक खोता हुआ औजार ? भारत में जनहित याचिका को कभी “गरीबों की अदालत” कहा गया था लेकिन आज स्थिति यह है कि:-

# जनहित याचिका का उपयोग कम हो रहा है

# और जहां होना चाहिए, वहां चुप्पी छाई हुई है

   इकाना स्टेडियम का ट्रैफिक जाम एक ऐसा मुद्दा है जहां न्यायिक हस्तक्षेप तुरंत जरूरी है लेकिन पहल करने वाला कोई नहीं है ।

  @@समाधान : सिर्फ आलोचना नहीं, कार्रवाई जरूरी

  @समस्या का समाधान केवल प्रशासन को कोसने से नहीं होगा इसके लिए:-

1. वकीलों को आगे आना होगा

• जनहित याचिका दायर करनी होगी

• जवाबदेही तय करनी होगी

2. बार एसोसिएशनों को पहल करनी चाहिए

• इस मुद्दे को संस्थागत रूप से उठाना चाहिए

3. जनता और सिविल सोसायटी को दबाव बनाना होगा

  @निष्कर्ष : चुप्पी भी अपराध है, इकाना स्टेडियम के बाहर लगने वाला ट्रैफिक जाम सिर्फ एक असुविधा नहीं बल्कि सिस्टम की सामूहिक विफलता है जिसमें प्रशासन के साथ-साथ वकीलों की निष्क्रियता भी बराबर की भागीदार है, जब कानून के रखवाले ही चुप हो जाएं, तो अव्यवस्था का बढ़ना तय है, अब समय है कि लखनऊ का विधिक समुदाय अपनी चुप्पी तोड़े क्योंकि न्याय केवल अदालतों में नहीं, बल्कि समाज में भी स्थापित होता है ।

साभार : शिखर अधिवक्ता उच्च न्यायालय लखनऊ पीठ ।

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