एक्सप्रेसवे पर स्पीड कैमरों का निष्क्रिय होना, क्या दुर्घटनाओं को खुला निमंत्रण ?
एक्सप्रेसवे पर स्पीड कैमरों का निष्क्रिय होना, क्या दुर्घटनाओं को खुला निमंत्रण ?
भारत में एक्सप्रेसवे आधुनिक आधारभूत संरचना के प्रतीक हैं, इनका उद्देश्य केवल यात्रा का समय कम करना नहीं, बल्कि सुरक्षित, अनुशासित और वैज्ञानिक यातायात व्यवस्था स्थापित करना भी है, इसी उद्देश्य से विभिन्न एक्सप्रेसवे पर स्वचालित स्पीड कैमरे लगाए गए हैं ताकि निर्धारित गति सीमा का पालन सुनिश्चित किया जा सके किंतु यदि यही कैमरे लंबे समय तक बंद पड़े रहें या प्रभावी रूप से कार्य नही करें तो यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर उदाहरण है ।
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सड़क दुर्घटनाओं के प्रमुख कारणों में अत्यधिक गति सबसे ऊपर है, जब वाहन चालकों को यह पता चल जाता है कि स्पीड कैमरे निष्क्रिय हैं तो गति सीमा का उल्लंघन बढ़ जाता है, परिणामस्वरूप दुर्घटनाओं की संख्या और उनकी गंभीरता दोनों में वृद्धि होती है, ऐसी दुर्घटनाओं में केवल नियम तोड़ने वाले ही नहीं, बल्कि निर्दोष यात्री और अन्य सड़क उपयोगकर्ता भी अपनी जान गंवाते हैं।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है, उच्चतम न्यायालय ने अनेक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि सुरक्षित सड़कें और प्रभावी यातायात प्रबंधन भी जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग हैं, यदि सड़क सुरक्षा के लिए स्थापित तकनीकी तंत्र को ही कार्यशील नहीं रखा जाता तो यह नागरिकों के जीवन की रक्षा करने के राज्य के संवैधानिक दायित्व की उपेक्षा है, सड़क सुरक्षा के संबंध में उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन हेतु गठित कमेटी ऑन रोड सेफ्टी ने भी बार-बार यह रेखांकित किया है कि गति सीमा का प्रभावी प्रवर्तन सड़क दुर्घटनाओं को कम करने का सबसे प्रभावी उपायों में से एक है, यदि स्पीड कैमरे बंद पड़े हैं तो प्रवर्तन व्यवस्था ही निष्प्रभावी हो जाती है ।
स्पीड कैमरों की स्थापना पर करोड़ों रुपये का सार्वजनिक धन खर्च किया जाता है, यदि उनका नियमित निरीक्षण, रखरखाव और मरम्मत नहीं की जाती, तो यह केवल वित्तीय अपव्यय नहीं बल्कि सार्वजनिक विश्वास के साथ भी अन्याय है, उत्तरदायी शासन का अर्थ केवल परियोजनाओं का उद्घाटन करना नहीं, बल्कि उन्हें निरंतर प्रभावी बनाए रखना भी है, यदि किसी एक्सप्रेसवे पर स्पीड कैमरे लंबे समय तक खराब पड़े रहें और उसी अवधि में अत्यधिक गति के कारण गंभीर दुर्घटनाएँ घटित हों तो यह प्रश्न अवश्य उठना चाहिए कि क्या संबंधित अधिकारियों की प्रशासनिक जवाबदेही निर्धारित की जाएगी ? सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े उपकरणों की उपेक्षा को सामान्य प्रशासनिक चूक मानकर नहीं छोड़ा जा सकता ।
सरकार को चाहिए कि प्रत्येक एक्सप्रेसवे पर स्थापित सभी स्पीड कैमरों का समय-समय पर स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कराया जाए, उनकी कार्यशीलता की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए तथा प्रत्येक खराब कैमरे को निर्धारित समय-सीमा के भीतर चालू करना अनिवार्य बनाया जाए, साथ ही रखरखाव में लापरवाही करने वाले अधिकारियों और एजेंसियों की उत्तरदायित्व-निर्धारण की स्पष्ट व्यवस्था भी होनी चाहिए, सड़क सुरक्षा केवल कठोर कानूनों से नहीं आती, वह उनके ईमानदार और सतत क्रियान्वयन से सुनिश्चित होती है, यदि स्पीड कैमरे केवल दिखावे के लिए लगे हों और वास्तव में कार्य न कर रहे हों तो वे सुरक्षा उपकरण नहीं बल्कि औपचारिक सजावट बनकर रह जाते हैं ।
एक विकसित भारत की पहचान केवल विश्वस्तरीय एक्सप्रेसवे नहीं, बल्कि उन पर सुरक्षित यात्रा भी है इसलिए स्पीड कैमरों का निष्क्रिय रहना एक साधारण तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि जनजीवन, विधि के शासन और प्रशासनिक उत्तरदायित्व से जुड़ा अत्यंत गंभीर प्रश्न है, सरकार और संबंधित प्राधिकरणों को इस विषय पर तत्काल, पारदर्शी और प्रभावी कार्रवाई करनी चाहिए, क्योंकि सड़क पर एक क्षण की लापरवाही किसी परिवार के लिए आजीवन त्रासदी बन सकती है।
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साभार : शिखर अधिवक्ता उच्च न्यायालय लखनऊ पीठ







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