अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ के लिए एक समान थे मंदिर और मसजिद

अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ के लिए एक समान थे मंदिर और मसजिद 
-मात्र 27 वर्ष की आयु में 19 दिसम्बर 1927 को फैज़ाबाद में दे दी गई थी फांसी 
-"जमीं दुश्मन, जमां दुश्मन, जो अपने थे पराये हैं, सुनोगे दास्ताँ क्या तुम मेरे हाले परेशाँ की।"-अशफाक उल्ला खां
    अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ का जन्म 22 अक्टूबर, 1900 ई. को उत्तर प्रदेश में शाहजहाँपुर ज़िले के 'शहीदगढ़' नामक स्थान पर हुआ था, इनके पिता का नाम मोहम्मद शफ़ीक़ उल्ला ख़ाँ था, जो एक पठान परिवार से ताल्लुक रखते थे तथा माता मजहूरुन्निशाँ बेगम थीं, इनकी माता बहुत सुन्दर थीं और ख़ूबसूरत स्त्रियों में गिनी जाती थीं, इनका परिवार काफ़ी समृद्ध था, परिवार के सभी लोग सरकारी नौकरी में थे किंतु अशफ़ाक़ को विदेशी दासता विद्यार्थी जीवन से ही खलती थी, वे देश के लिए कुछ करने को बेताव थे, बंगाल के क्रांतिकारियों का उनके जीवन पर बहुत प्रभाव था ।


   अपनी बाल्यावस्था में अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ का मन पढ़ने-लिखने में नहीं लगता था, खनौत में तैरने, घोड़े की सवारी करने और भाई की बन्दूक लेकर शिकार करने में इन्हें बड़ा आनन्द आता था, ये बड़े सुडौल, सुन्दर और स्वस्थ जवान थे, चेहरा हमेशा खिला रहता था और दूसरों के साथ हमेशा प्रेम भरी बोली बोला करते थे, बचपन से ही उनमें देश के प्रति अपार अनुराग था, देश की भलाई के लिये किये जाने वाले आन्दोलनों की कथाएँ वे बड़ी रुचि से पड़ते थे।
  अशफ़ाक़ कविताएं भी किया करते थे, उन्हें इसका बहुत शौक़ था, उन्होंने बहुत अच्छी-अच्छी कवितायें लिखी थीं, जो स्वदेशानुराग से सराबोर थीं, कविता में वे अपना उपनाम हसरत लिखते थे, उन्होंने कभी भी अपनी कविताओं को प्रकाशित कराने की चेष्टा नहीं की, उनका कहना था कि "हमें नाम पैदा करना तो है नहीं, अगर नाम पैदा करना होता तो क्रान्तिकारी काम छोड़ लीडरी न करता?" उनकी लिखी हुई कविताएँ अदालत आते-जाते समय अक्सर 'काकोरी कांड' के क्रांतिकारी गाया करते थे ।
 अपनी  भावनाओं का इजहार करते हुए अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ ने लिखा था कि- "जमीं दुश्मन, जमां दुश्मन, जो अपने थे पराये हैं, सुनोगे दास्ताँ क्या तुम मेरे हाले परेशाँ की।"


  काकोरी घटना के बाद अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ शाहजहाँपुर छोड़कर बनारस आ गए और वहाँ दस महीने तक एक इंजीनियरिंग कंपनी में काम किया, इसके बाद उन्होंने इंजीनियरिंग के लिए विदेश जाने की योजना बनाई ताकि वहाँ से कमाए गए पैसों से अपने क्रांतिकारी साथियों की मदद करते रहें, विदेश जाने के लिए वह दिल्ली में अपने एक पठान मित्र के संपर्क में आए लेकिन उनका वह दोस्त विश्वासघाती निकला, उसने इनाम के लालच में अंग्रेज़ पुलिस को सूचना दे दी और इस तरह अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ पकड़ लिए गए।


   जेल में अशफ़ाक़ उल्ला खां को कई तरह की यातनाएँ दी गईं, जब उन पर इन यातनाओं का कोई असर नहीं हुआ तो अंग्रेज़ों ने तरह−तरह की चालें चलकर उन्हें सरकारी गवाह बनाने की कोशिश की लेकिन अंग्रेज़ अपने इरादों में किसी भी तरह कामयाब नहीं हो पाए, अंग्रेज अधिकारियों ने उनसे यह तक कहा कि हिन्दुस्तान आज़ाद हो भी गया तो भी उस पर मुस्लिमों का नहीं हिन्दुओं का राज होगा और मुस्लिमों को कुछ नहीं मिलेगा, इसके जवाब में अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ ने अंग्रेज़ अफ़सर से कहा कि- "फूट डालकर शासन करने की चाल का उन पर कोई असर नहीं होगा और हिन्दुस्तान आज़ाद होकर रहेगा"। 


  उन्होंने अंग्रेज़ अधिकारी से कहा- "तुम लोग हिन्दू-मुस्लिमों में फूट डालकर आज़ादी की लड़ाई को बिलकुल नहीं दबा सकते, अपने दोस्तों के ख़िलाफ़ मैं सरकारी गवाह कभी नहीं बनूँगा", मात्र 27 वर्ष की आयु में 19 दिसम्बर, 1927 को अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ को फैजाबाद जेल में फाँसी दे दी गई, इस तरह भारत का यह महान् सपूत देश के लिए अपना बलिदान दे गया, उनकी इस शहादत ने देश की आज़ादी की लड़ाई में हिन्दू-मुस्लिम एकता को और भी अधिक मजबूत कर दिया, आज भी उनका दिया गया बलिदान देशवासियों को एकता के सूत्र में पिरोने का काम करता है ।


  अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ के लिए मंदिर और मसजिद एक समान थे, एक बार जब शाहजहाँपुर में हिन्दू और मुस्लिमों में झगड़ा हुआ और शहर में मारपीट शुरू हो गई, उस समय अशफ़ाक़ बिस्मिल जी के साथ आर्य समाज मन्दिर में बैठे हुए थे, कुछ मुस्लिम मन्दिर के पास आ गए और आक्रमण करने के लिए तैयार हो गए, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ ने अपना पिस्तौल निकाल लिया और आर्य समाज मन्दिर से बाहर आकर मुस्लिमों से कहने लगे कि "मैं कटटर मुसलमान हूँ, परन्तु इस मन्दिर की एक-एक ईंट मुझे प्राणों से प्यारी है, मेरे नजदीक मन्दिर और मसजिद की प्रतिष्ठा बराबर है, अगर किसी ने इस मन्दिर की ओर निगाह उठाई तो गोली का निशाना बनेगा, अगर तुमको लड़ना है तो बाहर सड़क पर चले जाओ और खूब दिल खोल कर लड़ लो।" उनकी इस सिंह गर्जना को सुन सबके होश गुम हो गए और किसी का साहस नहीं हुआ, जो आर्य समाज मन्दिर पर आक्रमण करे, यह अशफ़ाक़ का सार्वजनिक प्रेम था ।
  एक बार अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ बहुत बीमार पड़ गये, उस समय वे 'राम-राम' कहकर पुकारने लगे, माता-पिता ने बहुत कहा कि तुम मुस्लिम हो, खुदा-खुदा कहो, परन्तु उस प्रेम के सच्चे पुजारी के कान में यह आवाज़ ही नहीं पहुँची और वह बराबर 'राम-राम' कहते रहे, माता-पिता तथा अन्य सम्बन्धियों की समझ में यह बात नहीं आई, उसी समय एक अन्य व्यक्ति ने आकर उनके सम्बन्धियों से कहा कि यह रामप्रसाद बिस्मिल को याद कर रहे हैं, यह एक-दूसरे को राम और कृष्ण कहते हैं, एक आदमी जाकर बिस्मिल जी को बुला लाया, उनको देखकर अशफ़ाक़ ने कहा "राम तुम आ गए", उस समय उनके घर वालों को राम का पता चला, अशफ़ाक़ के इन आचरणों से उनके सम्बन्धी कहते थे कि वे काफ़िर हो गये हैं, किन्तु वे इन बातों की कभी परवाह नहीं करते थे और सदैव एकाग्र चित्त से अपने व्रत पर अटल रहे ।

 

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