राधाष्टमी पर्व : श्रीकृष्ण की ही शक्ति का स्वरूप हैं राधारानी
राधाष्टमी पर्व : श्रीकृष्ण की ही शक्ति का स्वरूप हैं राधारानी
-राधा जी श्रीकृष्ण से अलग नहीं बल्कि उनकी ही शक्ति का स्वरूप हैं राधा जी
-भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को हुआ था बृषभानु दुलारी राधारानी का जन्म
राधा रानी हिंदू धर्म में भगवान श्रीकृष्ण की मुख्य संगिनी, उनकी ह्लादिनी शक्ति और प्रेम व भक्ति की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं, राधा रानी का जन्म भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को हुआ था, इस पवित्र तिथि को राधा अष्टमी के रूप में मनाया जाता है, राधा रानी का प्राकट्य मथुरा के निकट यमुना किनारे स्थित रावल गांव में हुआ था, राधारानी के पिता का नाम राजा वृषभानु और माता का नाम कीर्तिदा था, वहीं कुछ जगह उनकी माता का नाम कलावती भी बताया जाता है ।
राजा वृषभानु ब्रज के एक प्रतिष्ठित और संपन्न यादव शासक थे, जन्म के शुरुआती कुछ वर्ष राधा जी ने रावल गांव में बिताए थे, इसके बाद उनके पिता वृषभानु जी बरसाना आ गए थे जिसकी वजह से राधा रानी का मुख्य रूप से पालन-पोषण और क्रीड़ा स्थली बरसाना ही रहा, बरसाना में राधारानी जी का प्रसिद्ध लाडलीजी मंदिर स्थित है, गौड़ीय वैष्णव और अन्य पुराणों के अनुसार, राधा जी श्रीकृष्ण से अलग नहीं हैं, बल्कि उनकी ही शक्ति का स्वरूप हैं, जैसे सूर्य और उसकी धूप, वैसे ही कृष्ण और राधा एक ही तत्व के दो रूप हैं, कई शास्त्रों में उन्हें माता लक्ष्मी का ही अवतार माना गया है ।.jpg)
भगवान श्रीकृष्ण ने राधा रानी से विवाह इसलिए नहीं किया क्योंकि उनका प्रेम भौतिक बंधनों या विवाह की सीमाओं से परे एक आत्मिक और अलौकिक मिलन था, भगवान कृष्ण और राधा का प्रेम स्वार्थ रहित और शुद्ध था, विवाह दो अलग व्यक्तियों के बीच होता है जबकि राधा और कृष्ण दार्शनिक रूप से एक ही थे यानी दो शरीर, एक आत्मा, उन्होंने दुनिया को यह सिखाने के लिए बिना विवाह के प्रेम का सर्वोच्च आदर्श स्थापित किया कि प्रेम के लिए विवाह आवश्यक नहीं है ।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से राधा को जीवात्मा और कृष्ण को परमात्मा माना गया है, जीवात्मा और परमात्मा का यह संबंध सांसारिक विवाह से ऊपर भक्ति और समर्पण का प्रतीक है, श्री कृष्ण का जन्म पृथ्वी पर धर्म की स्थापना और दुष्टों का नाश करने के लिए एक निश्चित उद्देश्य से हुआ था, श्रीकृष्ण को वृंदावन छोड़कर मथुरा और द्वारका जाना पड़ा तथा राजनीतिक व सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने पड़े जबकि राधा वृंदावन में ही रहीं इसलिए उनका यह प्रेम वियोग और अटूट समर्पण की मिसाल बन गया ।



















