अयोध्या : लेखपाल उत्कर्ष दीप गिरफ्तारी पर उठे गंभीर सवाल
अयोध्या : लेखपाल उत्कर्ष दीप गिरफ्तारी पर उठे गंभीर सवाल
-एंटी करप्शन टीम की कार्रवाई पर लगे प्रश्नचिह्न, वीडियो को बनाया गया अहम साक्ष्य
अयोध्या । राजस्व लेखपाल उत्कर्ष दीप को एंटी करप्शन टीम द्वारा कथित रूप से गिरफ्तार किए जाने का मामला अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गया है, मामले में सामने आए वीडियो को महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिसके आधार पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया सामान्य ट्रैप कार्रवाई के अनुरूप नही होकर विवादास्पद परिस्थितियों में हुई, सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या लेखपाल को वास्तव में रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया अथवा परिस्थितियों को इस प्रकार बनाया गया कि उन्हें आरोपी बनाकर गिरफ्तार किया जा सके ? जिसका उत्तर निष्पक्ष जांच और उपलब्ध वीडियो फुटेज के वैज्ञानिक परीक्षण से ही सामने आ सकता है ।
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बताया जा रहा है कि इस पूरी घटना से संबंधित वीडियो उपलब्ध है, यदि वीडियो में गिरफ्तारी से पहले और गिरफ्तारी के दौरान की घटनाएं स्पष्ट रूप से रिकॉर्ड हैं, तो वह जांच एजेंसी के लिए भी महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकता है, वीडियो की मूल प्रति, रिकॉर्डिंग का समय, स्रोत, मेटाडाटा तथा उसकी निरंतरता की जांच कराई जानी चाहिए, साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि वीडियो में रिश्वत की मांग, धन का स्वैच्छिक आदान-प्रदान तथा गिरफ्तारी की वास्तविक परिस्थितियां क्या दिखाई देती हैं ?
भ्रष्टाचार के मामलों में केवल किसी सरकारी कर्मचारी के पास से रकम की बरामदगी को पूरे मामले का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता, जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा यह निर्धारित करना है कि रकम किस परिस्थिति में कर्मचारी तक पहुंची, क्या रिश्वत की मांग की गई थी और क्या आरोपी ने रकम को अपनी स्वेच्छा से स्वीकार किया था इसीलिए यदि वीडियो में ऐसा कोई तथ्य सामने आता है जिससे यह प्रतीत हो कि आरोपी के पास रकम जबरन पहुंचाई गई अथवा गिरफ्तारी से पहले घटनाक्रम सामान्य ट्रैप की प्रक्रिया से अलग था, तो उस पहलू की निष्पक्ष जांच आवश्यक हो जाती है ।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई आवश्यक है और रिश्वतखोरी करने वाले किसी भी सरकारी कर्मचारी को कानून से संरक्षण नहीं मिलना चाहिए लेकिन भ्रष्टाचार विरोधी कार्रवाई का उद्देश्य भ्रष्टाचार को समाप्त करना है, किसी निर्दोष व्यक्ति को आरोपी बनाना नहीं, पूर्व में भी लेखपाल संगठनों ने एंटी-करप्शन ट्रैप की कार्य प्रणाली को लेकर शिकायतें उठाई हैं और आरोप लगाए हैं कि कुछ मामलों में शिकायतकर्ता द्वारा धन जबरन कर्मचारी तक पहुंचाने जैसी परिस्थितियां उत्पन्न की गईं इसलिए उत्कर्ष दीप के मामले में भी दोनों पक्षों को सुने बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा ।
इस मामले में निम्न बिंदुओं की स्वतंत्र रूप से जांच होनी चाहिए:-
1. शिकायतकर्ता ने रिश्वत की मांग के संबंध में क्या शिकायत की थी ?
2. शिकायत की प्रारंभिक जांच किस अधिकारी ने की ?
3. ट्रैप से पहले क्या सत्यापन किया गया ?
4. रिश्वत की रकम किसके पास से और किस परिस्थिति में बरामद हुई ?
5. क्या पूरी कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग उपलब्ध है ?
6. उपलब्ध वीडियो की मूल प्रति सुरक्षित है या नहीं ?
7. वीडियो में गिरफ्तारी से पहले का पूरा घटनाक्रम क्या है ?
8. स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी में कार्रवाई की गई या नहीं ?
9. बरामद रकम पर आवश्यक रासायनिक परीक्षण और अन्य कानूनी प्रक्रियाएं विधिवत पूरी की गईं या नहीं ?
10. क्या आरोपी को अपनी बात रखने और कानूनी अधिकारों का पूर्ण अवसर दिया गया ?
कानून का मूल सिद्धांत है कि किसी व्यक्ति को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता जब तक सक्षम न्यायालय में आरोप सिद्ध न हो जाएं इसलिए उत्कर्ष दीप के मामले में भी जांच पूरी होने और न्यायालय के निर्णय से पहले उन्हें अपराधी घोषित करना उचित नहीं होगा, वहीं दूसरी ओर, यदि जांच में रिश्वत की मांग और स्वीकार करने के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं तो कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए ।
यह मामला केवल एक लेखपाल की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है, यह प्रश्न एंटी करप्शन कार्रवाई की विश्वसनीयता और पारदर्शिता से जुड़ा है, जब किसी सरकारी कर्मचारी को भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है तो कार्रवाई जितनी महत्वपूर्ण होती है, उतनी ही महत्वपूर्ण उसकी निष्पक्षता भी होती है, यदि किसी कार्रवाई पर वीडियो साक्ष्य के आधार पर ही सवाल उठने लगें तो संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी बनती है कि वे वीडियो सहित सभी इलेक्ट्रॉनिक और प्रत्यक्ष साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच कराएं ।
उत्कर्ष दीप प्रकरण में उपलब्ध वीडियो को तत्काल सुरक्षित कराकर उसकी स्वतंत्र एवं वैज्ञानिक जांच कराई जानी चाहिए तथा यदि वीडियो गिरफ्तारी की परिस्थितियों पर प्रश्न उठाता है तो उन परिस्थितियों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई मजबूत होनी चाहिए लेकिन यह लड़ाई कानून की प्रक्रिया और निर्दोष व्यक्ति के अधिकारों की कीमत पर नहीं लड़ी जा सकती ।
साभार : शिखर अधिवक्ता उच्च न्यायालय लखनऊ खण्डपीठ







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