सावन : रांझा, ढोला, मल्हार गायब, अब पहली पसंद बने हाऊजी, फिल्मी पैरोडी

सावन : रांझा, ढोला, मल्हार गायब, अब पहली पसंद बने हाऊजी, फिल्मी पैरोडी 
-आधुनिकता के दौर में बदल रहे हैं तीज त्योहार मनाने के तरीके, विलुप्त हुईं परंपराएं 
  मथुरा । ब्रज को ब्रज बनाने के लिए हजार जतन हो रहे हैं लेकिन ब्रज अपनी मौलिकता खो रहा है, ब्रज की तीज त्योहार व परंपरागत आयोजनों में ही असली ब्रज बसता है। दो तीन दशक में ही पूरा परिदृश्य बदल गया है। यहां तक कि ब्रज अपने तीज त्योहार मनाने के तरीकों और परंपराओं को खो रहा है ।
    ब्रजवासियों से पूछो तो ब्रज में सावन सूना सूना सा लग रहा है, "न अमुआ की डाली पर झूले पडे हैं" और "नहीं बूरा खाने वालों की टोली ही नजर आते हैं" "न ठेका कूदते और "न कबडी खेलती युवाओं की टोली ही नजर आती हैं", हां मठ मंदिर में जरूर परंपरागत आयोजन चल रहे हैं, हिंडोले पड रहे हैं, पर ब्रज में सावन का असल रंग कहीं खोसा गया है। सावन के महीने में सुनाई देने वाली मल्हार भी अब कहीं सुनने को नहीं मिलती हैं, रांझा और ढोला गायन जैसी परंपराएं पहले ही विलुप्त प्राय हो चली हैं। तीज राखी के आयोजनों में अब रांझा, मल्हार ढोल की जगह हाउजी, फिल्मी पैरोडी ने ले ली है, सावन का महीना और बूरा खाने का रिवाज एक दूसरे के पर्यायवाची रहे हैं लेकिन अब ऐसा नहीं है। 
   बलदेव के अतुल जिंदल कहते हैं कि अब तो बस यादें हैं। भागम भाग वाली जिंदगी में अब मन बस पुरानी यादों को याद कर ही संतुष्ट हो लेता है। उन्होंने बताया कि अब तो बूरा खाना कुछ घंटों का हा कार्यक्रम रह गया है। मेहमान रक्षाबंधन पर या उसके एक दो दिन पहले आते हैं। दो तीन घंटे ही रूकते हैं तथा खाना खाकर भेंट लेकर चले जाते हैं बहन भी राखी देकर रक्षाबंधन के दिन बांधने का निर्देश देकर चली जाती है। 
   वहीं लोकेश चौधरी कहते हैं कि अब प्रेम भाव खत्म हो गया है तथा शहर में लोगों के पास समय नहीं है और ऐसे समय में गावों में गुटबन्दी के कारण एक दूसरे के दरवाजे पर जाना भी लोग गवारा नहीं करते हैं। चहुंओर बिखरी हरियाली, भीगी मांटी की खुशबू और युवाओं की टोलियां, कुश्ती, कबड्डी और लम्बी कूद लगाते युवाओं के झुंड सावन के महीने में कहीं भी दिख जाते थे। सुरीर निवासी ज्ञानेन्द्र सिंह का कहना था कि पहले गांव में बूरा खाना एक पर्व और उत्सव की तरह मनाया जाता था जिसमें गांव के सभी लोग मिलजुलकर भाग लेते थे पर अब यह केवल औपचारिकता तक ही सीमित रह गया है।

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