नागचंद्रेश्वर मंदिर : नाग पंचमी के दिन वर्ष में एक बार ही खुलता है यह मंदिर

नागचंद्रेश्वर मंदिर : नाग पंचमी के दिन वर्ष में एक बार ही खुलता है यह मंदिर 
-मध्यप्रदेश की उज्जैन नगरी में स्थित है नागचंद्रेश्वर मंदिर, सर्प शैया पर विराजित हैं भगवान शंकर
  जैसा कि सर्वविदित है कि भगवान विष्णु को सर्प शैया पर विराजमान हैं लेकिन एक ऐसा मंदिर भी है, जहाँ भगवान शंकर सर्प शैय्या पर विराजमान हैं, इस मंदिर को नागचंद्रेश्वर के नाम से जाना जाता है और यह मंदिर वर्ष में केवल एक बार नागपंचमी के दिन ही खुलता है और दर्शनार्थियों को दर्शन का लाभ मिलता है, नागचंद्रेश्वर मंदिर मध्य प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में स्थित है, महाकाल मंदिर के शिखर तल पर स्थापित इस नागचंद्रेश्वर प्रतिमा के दर्शन करने के लिए उज्जैन में प्रतिवर्ष इस दिन लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है ।


     महाकाल की नगरी उज्जैन अद्भुत, अनुपम और विलक्षण हैं, यहां भगवान महाकाल विविध स्वरुपों में विराजमान हैं, वह कहीं स्वप्नेश्वर महादेव के रुप में दर्शन देते हैं तो कहीं बृहस्पतेश्वर महादेव के रुप में, उज्जैन के महाकाल परिसर में ही नवग्रहों से लेकर अन्य अनगिनत रुपों में भगवान महाकाल विराजमान हैं, इसी महाकाल मंदिर में भगवान नागचंद्रेश्वर भी विराजमान हैं जो सिर्फ नाग पंचमी के दिन ही अपने भक्तों को दर्शन देते हैं, लाखों करोड़ों शिवभक्तों की आस्था का केंद्र नागचन्द्रेश्वर मंदिर एक अद्वितीय मंदिर है, जो भगवान शिव और नाग देवता को समर्पित है, महाकाल परिसर के गर्भग्रह में देवाधिदेव महाकाल अपने विशाल स्वरुप में स्थापित हैं, इसी मंदिर के ठीक ऊपर भगवान सदाशिव ओंकारेश्वर स्वरुप में विराजित हैं और इनके ठीक ऊपर भगवान नागचंद्रेश्वर का मंदिर हैं ।
   नागचन्द्रेश्वर मंदिर वर्ष में सिर्फ एक दिन, नाग पंचमी के अवसर पर खुलता है, स्कंद पुराण के अवंत्यखंड में नागचन्द्रेश्वर का उल्लेख किया गया है, स्कंद पुराणों में उल्लिखित कथाओं और विवरणों के अनुसार नागचन्द्रेश्वर मंदिर भगवान शिव और नागराज तक्षक से जुड़ा है, मान्यता है कि  सर्पों के राजा तक्षक ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए घनघोर तपस्या की थी, तब नागराज की कठोर तपस्या से भगवान शंकर अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें अमरता का वरदान प्रदान किया, महादेव की कृपा पाकर नागराज तक्षक महाकाल वन में ही वास करना चाहते थे, वह यह भी चाहते थे कि इससे उनकी शिव आराधना में कोई विघ्न नही आए, उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए इस मंदिर के द्वार वर्ष में सिर्फ एक ही दिन नागपंचमी पर भक्तों के दर्शनार्थ खोले जाते हैं ।
    बताया जाता है कि परमार राजा भोज ने 1050 ईस्वी के करीब इस मंदिर का निर्माण करवाया था, इसके बाद सिंधिया परिवार के महाराज राणोजी सिंधिया ने 1732 में महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया, श्री नागचंद्रेश्वर महादेव की यह मनमोहक प्रतिमा ग्यारहवीं सदी में नेपाल से लाकर स्थापित की गयी है, इस मूर्ति में भगवान शिव, माता पार्वती और दोनों पुत्रों गणेशजी व स्वामी कार्तिकेय के साथ विराजमान हैं, मूर्ति में ऊपर की ओर सूर्य और चन्द्रमा भी है, माना जाता है, संपूर्ण विश्व में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां भगवान शिव पूरे परिवार के साथ नाग की शैय्या पर विराजमान हैं, इसमें नागचंद्रेश्वर सात फनों से सुशोभित हैं, मान्‍यता है कि उज्‍जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है ।
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नाग पंचमी के अवसर पर नागचंद्रेश्वर की त्रिकाल पूजा की जाती है, यहां भगवान नागचंद्रेश्वर की त्रिकाल पूजा की परंपरा है, त्रिकाल पूजा का मतलब है कि तीन अलग-अलग समय पर अलग अलग पूजा किया जाना है जिसमें सबसे पहली पूजा मध्यरात्रि में महानिर्वाणी होती है, दूसरी पूजा नागपंचमी के दिन दोपहर में शासन द्वारा की जाती है, तीसरी पूजा नागपंचमी की शाम को भगवान महाकाल की पूजा के बाद मंदिर समिति करती है, इसके बाद रात बारह बजे फिर से एक वर्ष के लिए कपाट बंद कर दिए जाते हैं ।

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