काग़ज़ों में डिजिटल इंडिया, ज़मीनी हकीकत में देरी
काग़ज़ों में डिजिटल इंडिया, ज़मीनी हकीकत में देरी
-आधार अपडेट सेवाओं में यूआईडीएआई की विफलता से नागरिक परेशान
#एक पीड़ित नागरिक की कलम से
भारत सरकार बार-बार यह दावा करती है कि डिजिटल इंडिया के तहत सरकारी सेवाएँ तेज़, पारदर्शी और नागरिक-हितैषी हो गई हैं, आधार जिसे दुनिया की सबसे बड़ी बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली बताया जाता है, इसे डिजिटल क्रांति की सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, किंतु आम नागरिकों का वास्तविक अनुभव इन दावों की पोल खोल देता है—विशेषकर आधार अपडेट सेवाओं के संदर्भ में, जिनका संचालन यूआईडीएआई द्वारा किया जाता है ।
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यह लेख किसी नीति विशेषज्ञ का नहीं, बल्कि एक ऐसे आम नागरिक का है जिसने आधार अपडेट की प्रक्रिया में स्वयं मानसिक उत्पीड़न और प्रशासनिक उपेक्षा का सामना किया है । नाम, पता, जन्म-तिथि या बायोमेट्रिक में मामूली-सा संशोधन आज धैर्य की कठिन परीक्षा बन चुका है, ऑनलाइन पोर्टल बार-बार काम करना बंद कर देते हैं, ओटीपी समय पर नहीं आते, आवेदन महीनों तक “प्रक्रियाधीन” दिखते रहते हैं और हेल्पलाइन नंबर केवल औपचारिक जवाब देकर नागरिकों को टाल देते हैं, जब ऑनलाइन माध्यम असफल हो जाता है तो नागरिकों को आधार सेवा केंद्रों की ओर धकेल दिया जाता है, जहाँ समस्याएँ और भी बढ़ जाती हैं ।
आधार सेवा केंद्रों पर सुबह से ही लंबी कतारें लग जाती हैं, अपॉइंटमेंट आसानी से नहीं मिलते, कर्मचारी अत्यधिक दबाव में काम करते दिखाई देते हैं और नागरिकों की वास्तविक परेशानियों को गंभीरता से नहीं लिया जाता । बुज़ुर्गों, दिव्यांगों, छात्रों और दिहाड़ी मज़दूरों को घंटों प्रतीक्षा करनी पड़ती है—उस सेवा के लिए जिसे सरकार “त्वरित और सहज” बताती है, कई बार एक चक्कर पर्याप्त नहीं होता, कभी दस्तावेज़ों में मामूली त्रुटि बताकर लौटा दिया जाता है तो कभी नई-नई शर्तें जोड़ दी जाती हैं ।
इस देरी के परिणाम केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि अत्यंत गंभीर हैं । आज आधार लगभग हर आवश्यक सेवा से जुड़ा है—बैंक खाते, मोबाइल कनेक्शन, राशन कार्ड, छात्रवृत्ति, पेंशन, परीक्षाएँ और यहां तक कि अस्पतालों में इलाज तक । आधार में त्रुटि या अपडेट नही होने से राशन बंद हो सकता है, डीबीटी लाभ रुक सकता है, बैंक खाते फ्रीज़ हो सकते हैं और परीक्षाओं में बैठने से वंचित होना पड़ सकता है। ऐसे में यूआईडीएआई की लापरवाही सीधे नागरिकों के अधिकारों, गरिमा और आजीविका पर चोट करती है।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इस पूरी व्यवस्था में जवाबदेही का अभाव है, आधार अपडेट के लिए कोई सख़्त समय-सीमा प्रभावी रूप से लागू नहीं की जाती। शिकायत निवारण तंत्र कमजोर और अपारदर्शी है। ई-मेल का उत्तर नहीं मिलता, शिकायतें बिना समाधान के बंद कर दी जाती हैं और नागरिक स्वयं को असहाय महसूस करता है, जब राज्य किसी दस्तावेज़ को अनिवार्य बनाता है तो उसका यह संवैधानिक दायित्व भी है कि वह उस व्यवस्था को सुचारु और मानवीय बनाए।
सरकारी दावों और ज़मीनी सच्चाई के बीच का अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। एक ओर विज्ञापनों में डिजिटल सशक्तिकरण का जश्न मनाया जाता है, वहीं दूसरी ओर नागरिक देरी, भ्रम और उपेक्षा से जूझता रहता है। डिजिटल इंडिया केवल ऐप और पोर्टल से नहीं बल्कि नागरिकों के अनुभव से सफल माना जाएगा।
यूआईडीएआई को तत्काल आत्ममंथन कर सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए। आधार अपडेट सेवाओं को समयबद्ध और पारदर्शी बनाया जाए। अनावश्यक देरी के लिए अधिकारियों की जवाबदेही तय हो। आधार सेवा केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाए और कर्मचारियों को नागरिक-संवेदनशील बनाया जाए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आधार समावेशन का माध्यम बने, ना कि आम जनता के उत्पीड़न का कारण।
जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक डिजिटल इंडिया का सपना भाषणों और विज्ञापनों तक सीमित रह जाएगा और आम नागरिक की ज़िंदगी में केवल एक और संघर्ष बनकर रह जाएगा ।
साभार : शिखर अधिवक्ता उच्च न्यायालय लखनऊ पीठ।







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