मानवीय संवेदना का अभाव : उत्तर प्रदेश पुलिस को क्यों है सॉफ्ट स्किल प्रशिक्षण की सख़्त ज़रूरत ?
मानवीय संवेदना का अभाव : उत्तर प्रदेश पुलिस को क्यों है सॉफ्ट स्किल प्रशिक्षण की सख़्त ज़रूरत ?
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और घनी आबादी वाले राज्य में, जहाँ 24 करोड़ से अधिक लोग कानून-व्यवस्था के दायरे में जीवन व्यतीत करते हैं, वह संस्था जिसका मूल कर्तव्य नागरिकों की रक्षा और सेवा करना है, आज भय, दंभ और अनियंत्रित आक्रामकता का पर्याय बनती जा रही है। उत्तर प्रदेश पुलिस, जो न्याय की प्रहरी होनी चाहिए थी, अक्सर एक ऐसे तंत्र के रूप में देखी जाती है जहाँ पेशेवर आचरण पर क्रूरता हावी है और अधिकार को ज़िम्मेदारी नहीं बल्कि हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है ।

यह आरोप निराधार नहीं है। बार-बार पुलिस की बर्बरता से जुड़ी घटनाएँ—हिरासत में मौतें, सार्वजनिक अपमान, पीड़ितों का उत्पीड़न तथा जाति और वर्ग के आधार पर भेदभाव—समाचारों की सुर्खियाँ बनती रही हैं । इसके बावजूद, व्यवस्था में ठोस सुधार आज भी दूर की कौड़ी बना हुआ है । इस गहरी जड़ें जमाए समस्या का मूल कारण है—सॉफ्ट स्किल्स और बुनियादी व्यवहारिक प्रशिक्षण का अभाव ।
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#संवेदनहीन पुलिसिंग
पुलिसिंग का अर्थ केवल लाठी चलाना या हथियार लहराना नहीं होता । इसका सार है—समझ, संवेदना, संवाद और सबसे बढ़कर, जनता की सेवा । दुर्भाग्यवश, उत्तर प्रदेश में आज भी पुलिसिंग एक औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त दिखाई देती है, जहाँ नागरिकों को अधिकार-संपन्न नागरिक नहीं बल्कि शासित प्रजा की तरह देखा जाता है ।
एक आम नागरिक के लिए पुलिस से संपर्क करना अक्सर ठंडा, कठोर और अनावश्यक रूप से टकरावपूर्ण अनुभव बन जाता है । विशेष रूप से महिलाएँ, दलित, गरीब और हाशिए पर खड़े लोग, पुलिस थानों में सहानुभूति नहीं बल्कि संदेह, उपेक्षा और धमकियों का सामना करते हैं । साधारण-सी एफआईआर दर्ज कराना भी अपमानजनक प्रक्रिया बन चुका है। यह कानून का पालन नहीं, बल्कि @कानूनी भयादोहन है।
#वर्दी में विषाक्त पुरुषत्व
उत्तर प्रदेश पुलिस में एक गहरी जड़ें जमाए @विषाक्त पुरुषवादी संस्कृति व्याप्त है । भावनात्मक बुद्धिमत्ता को कमजोरी समझा जाता है और आक्रामकता को शक्ति का प्रतीक । अधिकारियों को “समझने” के बजाय “दबाने” की मानसिकता सिखाई जाती है ।
परिणामस्वरूप, हमारे पास ऐसी पुलिस है जो लाठी तो चला सकती है लेकिन बलात्कार पीड़िता से संवेदनशील संवाद नहीं कर सकती । ऐसी पुलिस जो मुठभेड़ का नाटक कर सकती है परंतु संवाद के माध्यम से सांप्रदायिक तनाव को शांत नहीं कर सकती । संघर्ष समाधान, संकट संवाद, ट्रॉमा-संवेदनशील पुलिसिंग और नैतिक आचरण जैसी सॉफ्ट स्किल्स को या तो गैरज़रूरी समझा जाता है या फिर कमजोरी का प्रतीक माना जाता है । यह विकृत सोच ऊपर से नीचे तक पूरे तंत्र को विषाक्त बना देती है।
#प्रशिक्षण की सच्चाई
भले ही भर्ती अभियानों में आधुनिकीकरण और सुधार के बड़े-बड़े दावे किए जाते हों लेकिन ज़मीनी हकीकत बेहद निराशाजनक है । उत्तर प्रदेश में पुलिस प्रशिक्षण आज भी शारीरिक अभ्यास और पुराने क़ानूनी पाठ्यक्रमों तक सीमित है । मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण, तनाव प्रबंधन, व्यवहारिक कौशल, नागरिक अधिकारों की समझ, विविधता के प्रति संवेदनशीलता और संवाद कौशल—इन सबका प्रशिक्षण ढांचे में लगभग कोई स्थान नहीं है और यह कोई वैकल्पिक कौशल नहीं हैं—ये अनिवार्य हैं । एक ऐसा पुलिसकर्मी जो सुनना, समझना और सम्मानपूर्वक बात करना नहीं जानता, वह समाज के लिए खतरा है ।
#परिणाम : अविश्वास और संस्थागत अत्याचार
सॉफ्ट स्किल्स और व्यवहारिक दक्षता की कमी केवल दिखावटी समस्या नहीं है । इसके गंभीर परिणाम सामने आते हैं—न्याय में देरी, झूठे मुकदमे, ग़लत गिरफ्तारियाँ, हिरासत में यातना और कभी-कभी मौत तक । इससे जनता का भरोसा टूटता है और कानून तथा नागरिकों के बीच खाई और गहरी हो जाती है । जब पुलिस नागरिकों को तिरस्कार की दृष्टि से देखती है, तब पूरी न्याय प्रणाली ढहने लगती है । लोग अपराध की रिपोर्ट करना बंद कर देते हैं, पीड़ित चुप हो जाते हैं, समुदायों में आक्रोश पनपता है और सबसे ख़तरनाक बात यह कि पुलिस लोकतंत्र का स्तंभ बनने के बजाय एक समानांतर शक्ति-केंद्र बन जाती है ।
#आगे का रास्ता
उत्तर प्रदेश पुलिस को केवल अधिक हथियारों, गाड़ियों या तकनीकी संसाधनों की ज़रूरत नहीं है । उसे @सोच और प्रशिक्षण में क्रांतिकारी बदलाव, की आवश्यकता है । तत्काल निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए—
*भर्ती और पदोन्नति के प्रत्येक स्तर पर अनिवार्य सॉफ्ट स्किल प्रशिक्षण
*लैंगिक संवेदनशीलता, जातिगत समानता, मानसिक स्वास्थ्य और ट्रॉमा-संवेदनशील पुलिसिंग पर कार्यशालाएँ
*व्यवहारिक शिकायतों की निगरानी के लिए स्वतंत्र तंत्र
*पुलिस कर्मियों के लिए मानसिक स्वास्थ्य परामर्श और तनाव प्रबंधन कार्यक्रम
*नागरिकों से नियमित फीडबैक लेने की प्रभावी व्यवस्था
@अंतिम शब्द
मानवता से विहीन पुलिस बल एक *चलता-फिरता विस्फोटक* होता है । उत्तर प्रदेश पुलिस को यह समझना होगा कि भय पैदा करना कानून का पालन नहीं है और बर्बरता शक्ति नहीं है । जब तक अहंकार त्यागकर संवेदना को नहीं अपनाया जाएगा, तब तक पुलिस और जनता के बीच दूरी बढ़ती ही जाएगी, अब समय आ गया है कि उत्तर प्रदेश पुलिस केवल कानून लागू करना ही नहीं, बल्कि उसे *सभ्य, संवेदनशील और मानवीय ढंग से लागू करना* भी सीखे ।

साभार : शिखर अधिवक्ता, उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ







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