अंडरट्रायल कैदियों का संकट : लंबित मुकदमे, बढ़ता आर्थिक बोझ और समयबद्ध न्याय की ज़रूरत

अंडरट्रायल कैदियों का संकट : लंबित मुकदमे, बढ़ता आर्थिक बोझ और समयबद्ध न्याय की ज़रूरत
    भारत के न्याय तंत्र की सबसे बड़ी और सबसे चिंताजनक विडंबना यह है कि देश की जेलों में बंद कैदियों का बड़ा हिस्सा आज भी दोषी नहीं, बल्कि अंडरट्रायल है, ऐसे नागरिक जिनके मुकदमे वर्षों से अदालतों में लंबित हैं, न्याय में देरी केवल न्याय से वंचित करने का साधन बनती जा रही है, बल्कि यह राज्य के खजाने पर भी भारी बोझ डाल रही है और मानवाधिकारों के मूल सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है।

@जेलों में अंडरट्रायल कैदियों की भयावह संख्या
   राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, भारत की जेलों में बंद कुल कैदियों में लगभग 75 प्रतिशत से अधिक अंडरट्रायल हैं, इनमें से हजारों ऐसे हैं, जो मामूली अपराधों में वर्षों से बंद हैं जबकि उनके मुकदमे आज तक तय ही नहीं हो पाए, कई मामलों में तो अंडरट्रायल कैद की अवधि उस अधिकतम सजा से भी अधिक हो जाती है, जो दोष सिद्ध होने पर दी जा सकती है ।

@लंबित मुकदमों का आर्थिक बोझ
   एक अनुमान के अनुसार, एक कैदी पर प्रतिदिन ₹100 से ₹150 तक का खर्च सरकार वहन करती है जिसमें भोजन, सुरक्षा, चिकित्सा और प्रशासनिक खर्च शामिल हैं, इस हिसाब से प्रतिवर्ष हजारों करोड़ रुपये केवल अंडरट्रायल कैदियों के जीवन-निर्वाह पर खर्च हो जाते हैं, यह व्यय उस समय और भी पीड़ादायक प्रतीत होता है, जब वही संसाधन शिक्षा, स्वास्थ्य और न्यायिक ढांचे को मजबूत करने में लगाए जा सकते थे ।

@न्याय में देरी : एक संस्थागत विफलता
   देश की अदालतों में पांच करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं, न्यायाधीशों की कमी, बार-बार स्थगन और न्यायिक अवकाशों की लंबी परंपरा ने इस संकट को और गहरा कर दिया है, परिणामस्वरूप, अंडरट्रायल कैदी बिना दोष सिद्ध हुए ही सजा भुगतने को मजबूर हैं ।

@क्या हो सकते हैं ठोस समाधान ?
   #इस स्थिति से निपटने के लिए अब असाधारण उपायों की आवश्यकता है—
  वरिष्ठ अधिवक्ताओं की अस्थायी न्यायिक नियुक्ति/प्रमोशन कर विशेष बेंचों का गठन, ताकि केवल लंबित आपराधिक मामलों का त्वरित निस्तारण हो सके ।
  #शीतकालीन और ग्रीष्मकालीन न्यायिक अवकाशों में कटौती या अस्थायी स्थगन जिससे समयबद्ध सुनवाई सुनिश्चित की जा सके ।
  #फास्ट-ट्रैक कोर्ट और मोबाइल कोर्ट का विस्तार, विशेष रूप से छोटे और पुराने मामलों के लिए ।
  #प्ली-बार्गेनिंग और वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र को प्रभावी ढंग से लागू करना।
@विदेशी देशों की प्रभावी न्यायिक प्रथाएं
  #अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में प्ली-डील सिस्टम और कठोर केस मैनेजमेंट के जरिए मामलों का शीघ्र निस्तारण किया जाता है, जापान में न्यायिक प्रक्रिया समय-सीमा से बंधी होती है जबकि जर्मनी में अनावश्यक स्थगन की अनुमति लगभग नहीं है, इन देशों में अंडरट्रायल कैद अपवाद है, नियम नहीं ।
@समयबद्ध न्याय: संवैधानिक अनिवार्यता
 भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 त्वरित न्याय को जीवन और स्वतंत्रता का अभिन्न अंग मानता है, अंडरट्रायल कैदियों की बढ़ती संख्या इस संवैधानिक गारंटी पर सीधा आघात है, अब समय आ गया है कि न्याय को केवल सैद्धांतिक अधिकार नही मानकर व्यवहारिक वास्तविकता बनाया जाए, यदि आज निर्णायक सुधार नहीं किए गए तो भारतीय जेलें दोषियों से अधिक निर्दोष नागरिकों की कब्रगाह बनती चली जाएंगी और यह किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा कलंक होगा ।


साभार : शिखर अधिवक्ता उच्च न्यायालय लखनऊ पीठ ।


 

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