ब्रजक्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण के अग्रदूत थे संत रमेश बाबा
ब्रजक्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण के अग्रदूत थे संत रमेश बाबा
-यमुना प्रदूषण मुक्ति और बरसाना की पहाड़ियों को बचाने के किये अथक प्रयास
-गांवों में निकलने वाली प्रभात फेरी और गौ संरक्षण के लिए भी रखा जाएगा याद
मथुरा । रमेश बाबा ब्रज के विरक्त संत होने के साथ ही पर्यावरण संरक्षण के अग्रदूत थे, उन्होंने बरसाना की पहाडियों के बचाने के साथ ही यमुना प्रदूषण मुक्ति के लिए बिगुल फूंका था, मथुरा से लेकर दिल्ली तक निकली पदयात्रा ने सरकार को हिला दिया था, गो संरक्षण और गावों में निकलने वाली प्रभात फेरी के लिए भी रमेश बाबा को याद रखा जाएगा ।.png)
ब्रज के विरक्त संत और बरसाना स्थित मान मंदिर के संस्थापक पद्मश्री रमेश बाबा का मंगलवार दोपहर गोलोकवास हो गया, वह काफी समय से अस्वस्थ चल रहे थे, उन्होंने मान मंदिर में अंतिम सांस ली, इस खबर से ब्रज संत समाज और श्रद्धालुओं में शोक की लहर दौड़ गई, रमेश बाबा को ब्रज के रसिकों की ओर से लंबे समय से विरक्त संत के रूप में सम्मान दिया जाता रहा, ब्रज के पौराणिक स्वरूप और धार्मिक परंपराओं के संरक्षण में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा, उन्हें पर्यावरण पुरोधा संत के रूप में भी जाना जाता था, उन्होंने ब्रज के वन-उपवन और भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़ीं प्राचीन पहाड़ियों के संरक्षण के लिए कई दशकों तक जन आंदोलनों का नेतृत्व किया ।
रमेश बाबा का जन्म तीर्थराज प्रयाग में हुआ था, उनके पिता जी विख्यात ज्योतिषाचार्य बलदेव प्रसाद शुक्ल और माता हेमेश्वरी देवी थीं, बताया जाता है कि दंपती ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से रामेश्वरम में पुत्र कामेष्टि यज्ञ किया था, शिव कृपा से वर्ष 1938 में पौष मास कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को दोपहर 12 बजे बाबा का जन्म हुआ, उनके ज्योतिषाचार्य पिता ने बालक के ललाट को देखते ही भविष्यवाणी कर दी थी कि यह बालक गृहस्थ जीवन स्वीकार नहीं करेगा और ब्रह्मचारी रहेगा, रमेश बाबा ने प्रारंभिक शिक्षा प्रयाग में ही प्राप्त की, बचपन से ही उनके भीतर आध्यात्मिक चेतना प्रबल थी, यही आध्यात्मिक आकर्षण उन्हें गृह त्याग कर ब्रजभूमि आने के लिए प्रेरित करता रहा ।
उन्होंने दो बार अपनी जन्मभूमि प्रयाग छोड़कर ब्रज आने का प्रयास किया लेकिन मां के स्नेह का बंधन उन्हें रोकता रहा, तीसरी बार उन्होंने सभी सांसारिक बंधनों को पीछे छोड़ दिया और ब्रजभूमि आ पहुंचे, इसके बाद ब्रज ही उनकी कर्मभूमि और साधना स्थली बन गया, बरसाना के मान मंदिर से उन्होंने भक्ति साधना के साथ ब्रज संस्कृति और प्राकृतिक विरासत के संरक्षण को भी अपना प्रमुख उद्देश्य बनाया, ब्रज के जंगलों पहाड़ियों और प्राचीन धार्मिक स्थलों के संरक्षण के लिए उनके प्रयासों को लंबे समय तक याद किया जाएगा, रमेश बाबा का जीवन त्याग साधना भक्ति और ब्रज संरक्षण के लिए समर्पित रहा, उनके निधन से ब्रज ने एक ऐसे संत को खो दिया जिसने आध्यात्मिक साधना के साथ अपनी कर्मभूमि की प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए भी जीवनभर संघर्ष किया ।













