अनिश्चितता के गलियारे में छटपटा रहा मथुरा का आलू किसान
अनिश्चितता के गलियारे में छटपटा रहा मथुरा का आलू किसान
मथुरा । आलू को नकदी फसल यानी कैश क्रॉप माना जाता है, पिछले दो सीजन से किसानों के लिए आलू कैश क्रॉप से क्रैश क्रॉप साबित हो रहा है, आलू की खेती करने वाले किसानों का हौसला टूट रहा है, एक अनुमान के तहत जनपद में आलू बुआई रकबा में 25 से 30 फीसदी तक की इस बार कमी आ सकती है, आलू किसानों की सबसे बडी मुसीबत यह है कि आलू की फसल के लिए सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी घोषित नहीं करती है ।.jpg)
पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आलू बेल्ट में इस समय आलू की कीमतों में आई भारी मंदी अभी भी बनी हुई है और बेमौसम बारिश ने किसानों की कमर तोड़ दी है, आलू की बेकद्री के कारण किसानों को उनकी लागत निकालना भी भारी पड़ रहा है जिससे आगामी बुआई सीजन से ठीक पहले उनका हौसला पूरी तरह पस्त हो चुका है, जनपद की मंडियों में आलू का थोक भाव घटकर औसतन 530 से 700 प्रति क्विंटल यानी महज 5.30 से 7 प्रति किलो के स्तर पर चल रहा है ।(40).jpg)
किसानों के अनुसार, प्रति 50 किलो के मोटे आलू के कट्टे का दाम केवल 300 से 350 मिल रहा है जबकि डीजल, महंगी डीएपी खाद और मजदूरी को मिलाकर किसानों की खुद की लागत ही 1,000 प्रति क्विंटल से अधिक आ रही है। बाजार में मंदी के कारण किसानों का लाखों टन आलू कोल्ड स्टोरेज में डंप पड़ा हुआ है। कोल्ड स्टोरेज का भारी किराया (लगभग 340 से 380 प्रति क्विंटल) चुकाने के बाद जब किसान फसल को मंडी लेकर जा रहे हैं, तो उन्हें भारी शुद्ध घाटा उठाना पड़ रहा है, कई जगह सही दाम नही मिलने और उठान न होने के कारण आलू कोल्ड स्टोरेज में ही सड़ने लगा है ।
भारतीय किसान यूनियन चढूनी की प्रदेश प्रवक्ता रामवीर सिंह तोमर का कहना है कि सरकार को किसानों के प्रति अपनी नीतियों में बदलाव करना होगा। सबसे बडा सवाल महंगाई की मार से किसानों को बचाने का है, उत्तर प्रदेश में किसान आलू की खेती जहां पडे पैमाने पर करता है, सरकार किसान को भाग्य भरोसे छोड़ देती है, किसान नेता पवन चतुर्वेदी का कहना है कि स्थानीय किसान संगठनों द्वारा इस गंभीर आर्थिक संकट को लेकर लगातार जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन किए गये हैं, किसान सरकार से मांग कर रहे हैं कि आलू के लिए एक न्यूनतम समर्थन मूल्य या भावांतर जैसी कोई ठोस संरक्षण प्रणाली लागू की जाए, कोल्ड स्टोरेज के किरायों में सब्सिडी दी जाए और संकटग्रस्त किसानों के कर्ज माफ किए जाएं ताकि वे अगली फसल के लिए दोबारा खड़े हो सकें ।















