इकाना स्टेडियम की पार्किंग व्यवस्था पर उठ रहे सवाल !!

इकाना स्टेडियम की पार्किंग व्यवस्था पर उठ रहे सवाल !!
क्या इकाना स्टेडियम की पार्किंग व्यवस्था पर्यावरणीय एवं कानूनी मानकों पर खरी उतरती है ?
   लखनऊ । भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी इकाना क्रिकेट स्टेडियम की पार्किंग और पर्यावरणीय व्यवस्थाओं को लेकर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों और बड़े आयोजनों के दौरान स्टेडियम के आसपास लगने वाले भारी ट्रैफिक जाम, सड़कों पर खड़े वाहनों, ध्वनि और वायु प्रदूषण तथा आपातकालीन सेवाओं की बाधित आवाजाही ने इस मुद्दे को केवल यातायात समस्या तक सीमित नहीं रहने दिया है, बल्कि यह शहरी नियोजन और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व का विषय बन गया है ।
  विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी बड़े सार्वजनिक ढांचे को अनुमति देते समय संबंधित विकास प्राधिकरणों की जिम्मेदारी होती है कि वे पर्याप्त पार्किंग, सुरक्षित निकास मार्ग, आपातकालीन पहुँच, हरित क्षेत्र संरक्षण और वैज्ञानिक ट्रैफिक प्रबंधन सुनिश्चित करें लेकिन बड़े आयोजनों के दौरान वास्तविक स्थिति इन मानकों पर प्रश्नचिह्न खड़े करती दिखाई देती है, कानूनी दृष्टि से भी कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आ रहे हैं, इनमें यह शामिल है कि क्या स्टेडियम की स्वीकृत योजना में पर्याप्त पार्किंग की व्यवस्था थी ?, क्या ट्रैफिक इम्पैक्ट असेसमेंट कराया गया था ?, क्या पर्यावरणीय मंजूरी की शर्तों का पालन हो रहा है तथा क्या सार्वजनिक सड़कों का उपयोग अस्थायी पार्किंग के रूप में किया जा रहा है ?
  पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी परियोजना के कारण अत्यधिक वायु और ध्वनि प्रदूषण, हरित क्षेत्र पर दबाव या सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तो मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र में भी आ सकता है, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार नागरिकों को प्राप्त है जबकि अनुच्छेद 48A और 51A(g) पर्यावरण संरक्षण का दायित्व राज्य और नागरिक दोनों पर डालते हैं ।
   इस बीच मांग उठ रही है कि स्टेडियम की स्वीकृत पार्किंग क्षमता सार्वजनिक की जाए, ट्रैफिक और पर्यावरणीय प्रभाव का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए तथा बड़े आयोजनों के लिए वैज्ञानिक मोबिलिटी और सार्वजनिक परिवहन योजना लागू की जाए, विशेषज्ञों का कहना है कि खेल और विकास आवश्यक हैं लेकिन ऐसा विकास जो शहर को प्रदूषण, अव्यवस्था और पर्यावरणीय संकट की ओर धकेले, उसे टिकाऊ विकास नहीं कहा जा सकता है ।
साभार : शिखर अधिवक्ता, उच्च न्यायालय लखनऊ पीठ ।

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